CORONA STORY

एक रोते हुए रामपुकार पंडित की कहानी जो अपने बेटे को अंतिम बार देख नहीं सके।

सड़क पर पैदल चल रहे यह लोग कौन है जिनेक सवाल और जवाब दोनों मोन हैं पूछो तो बस भूख, रोटी, और डंडे की मार हैं घर जाना है साहब बोल पाते है. बिना किसी शिकायत के बस पैदल चले जाते है अधूरी यात्राओं के बीच  बस हमे घर जाना है. इनकी थालियों में रोटी नहीं बस उसकी आवाज़ है, जिसमे भी अब शोर सुनाई नहीं दे रहा है.

दिल्ली के निजामुद्दीन ब्रिज पर बैठे इस प्रवासी मजदूर की तस्वीर को आपने सोशल मीडिया पर जरूर देखा होगा. ये तस्वीर न्यूज़ एजेंसी PTI के अतुल यादव ने खींची थी. पीटीआई ने इस तस्वीर को 11 मई, 2020 की ‘दिन की तस्वीर’ बताया. इसमें दिख रहे शख्स के बारे में जान लीजिए.

रामपुकार पंडित दिल्ली के नवादा में मजदूरी करते थे. लॉकडाउन की वजह से उनका काम बंद हो गया. रामपुकार बिहार के बेगूसराय के बरियापुर के रहने वाले हैं. गांव में उनके एक साल के बेटे की मौत हो गई है. बेटा रामप्रवेश बीमार चल रहा था. एक बाप के लिए इससे बुरी खबर क्या हो सकती है. खबर मिलने के बाद वह पैदल ही घर जाने के लिए निकल गए, लेकिन तीन दिन से यूपी गेट पर फंसे हुए थे. गाजियाबाद पुलिस उसे यूपी गेट नहीं पार करने दे रही थी. वे असफरों से गुजारिश करते रहे, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी.

‘हिन्दुस्तान’ में छपी ख़बर मुताबिक़, अंत में उन्होंने गाजीपुर फ्लाईओवर के नीचे डेरा डाल दिया. कई कोशिशें कीं, लेकिन प्रशासन ने उन्हें हर बार रोक दिया. रामपुकार को उम्मीद थी कि पुलिस वाले उनकी बात देर-सवेर मांन लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ

रामपुकार पंडित अब अपने घर बिहार के बेगूसराय आ गए है. 38 वर्षीय रामपुकार ने कहा , “मजदूरों की कोई जिनगी नहीं होती है वह तो पहिये में दलदल है. वह उस दिन को याद करते हुए बोलते है की “मैंने पुलिस से गुहार लगाई कि मुझे घर जाने दिया जाए लेकिन किसी ने मदद नहीं की,” उन्होंने फोन पर पीटीआई को बताया। “एक पुलिसकर्मी ने यहां तक ​​कहा कि क्या आप घर वापस जाएंगे तो आपका बेटा जिंदा हो जाएगा। यह लॉकडाउन है, आप नहीं जा सकते है। 

“अमीर को सभी सहायता मिल रही है और विदेशों से विमानों में घर लाया गया है। लेकिन हम गरीब प्रवासी मजदूरों को खुद के लिए छोड़ दिया गया है, ”उन्होंने कहा। “हम मज़दूरों का कोई देस नहीं है, हम मजदूर किसी भी देश के नहीं हैं।”

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