CORONA STORY

भूख से गुजर गई, खाना नहीं मिला. चार पांच दिन हो गए, घर में कुछ था ही नहीं.

पांच साल की बच्ची निमानी की मौत 16 मई की शाम 4 बजे झारखंड के लातेहार जिले में हो गई. निमानी का परिवार बार-बार भूख से मौत की बात कह रहा है

“भूख से गुजर गई, खाना नहीं मिला. चार पांच दिन हो गए, घर में कुछ था ही नहीं.” ये बोलते हुए कमलावती देवी रोने लगती हैं. कमलावती उसी पांच साल की निमानी की मां हैं जो अब दुनिया में नहीं रही. निमानी की मौत के बाद एक बार फिर सरकारी तंत्र सक्रीय होने का दम भर रहे हैं. लेकिन मासूम, नाबालिग निमानी की मौत को लेकर सरकारी तंत्र पर सवाल खड़े हुए है। 

सरकार अगर अपना काम कर रही है तो इन सबका जिम्मेदार कौन है, क्या सिस्टम ऐसा हो गया है जिसमे कागज पर दिखाया जाता है की ये काम हो गया है, जिसमे हमने इतने लोगो तक सहायता पहुंचा दी है, पर परदे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही होती है. अगर ये सब काम सरकार ने क्र दिया है तो क्यों मजदुर बोल रहा है की खाना नहीं है. जब भूख लगती है न साहब तो कूछ नहीं दिखता ये तो मजदुर है साहब खाली पेट भी सो जायेगा। 

जब निमानी के पिता से पूछा गया की आपको क्या राशन नहीं मिल रहा तो वो बोलते है :- राशन नहीं मिल रहा है, क्योंकि राशन कार्ड नहीं है, भूखा से ऐसे हो गया

झारखंड में लाखों के पास राशन कार्ड नहीं है. लाखों के आवेदन पेंडिंग हैं. लाखों के राशन कार्ड 2017 में रद्द कर दिए गए. लाखों के पास सफेद कार्ड है. इन तमाम लोगों को लॉकडाउन ने भूखे पेट सोने को मजबूर कर दिया है. सरकार ने कहा है कि जिन्होंने आवेदन किया है, उन्हें भी राशन देंगे और जिनके पास कार्ड नहीं है, उनके लिए भी इंतजाम है,पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कुछ और ही बंया करती है कैमरे पर जो दर्ज हुआ है, उसमें दर्द है, भूख है और है बेपनाह हताशा.झारखंड में लाखों के पास राशन कार्ड नहीं है. लाखों के आवेदन पेंडिंग हैं

झारखंड सरकार का कहना है कि 2017 में राशन कार्ड रद्द किए गए थे, उसकी वजह ये थी कि गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले ढेर सारे लोग सरकारी राशन ले रहे थे. अभी की स्थिति ये है कि करीब 6.9 लाख लोगों ने कार्ड के लिए आवेदन कर रखा है. झारखण्ड में राइट टू फूड की लड़ाई लड़ रही संस्था “राइट टू फूड कैम्पेन” के मुताबिक फिलहाल भी 3 लाख परिवार ऐसे हैं जो अशिक्षा या कम जानकारी के कारण आवेदन कर ही नहीं पाए हैं.

लेकिन लातेहार के जिला उपायुक्त जीशान कमर बताते हैं:- बच्ची दिन में खेलने गई थी, धूप में नदी किनारे. उनके घर में राशन था. जब The Quint के पत्रकार ने उनसे सवाल किया कि राशन तो उनके घर में मौत के बाद पहुंचाया गया तो जिला उपायुक्त ने साफ इंकार करते हुए कहा कि ऐसा नहीं है, आप जांच रिपोर्ट का इंतजार कीजिए. हालांकि, परिवार ने कैमरे पर बताया कि मौत के बाद राशन उनके घर पर ब्लॉक डेवलपमेंट अफसर ने पहुंचाया है. अब सवाल है कि आखिर झूठ कौन बोल रहा है? वो जिनकी बच्ची मर गई या वो जो राशन दे नहीं पाए. निमानी का परिवार उधार मांगकर, भीख मांगकर, पड़ोसियों के सहारे घर चला रहा था. बच्चे कुपोषित हैं. पिता भी बीमार हैं, इस हालत में किसी ना किसी की मौत तो होगी ही.

जगलाल भुइयां और कलावती देवी की बेटी निमानी तो अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन 10 सदसीय परिवार में पति, पत्नी और चार महीने से लेकर 13 वर्ष तक के 7 बच्चे मौजूद हैं, इस परिवार के पास न तो जमीन है और न ही राशन कार्ड. रही बात घर की तो कच्चे घर में छप्पर टुटा हुआ है, घर में सामान के नाम पर कुछ बर्तन, बिस्तर और एक फटी हुई मछरदानी को छोड़कर और कुछ भी नहीं हैं. केंद्र या राज्य सरकार ने अगर गाँव की हालत जानकर काम करवाया होता तो शायद आज हमारे बीच निमानी हसती खेलती जीवित होती, ये सिस्टम के साथ हम मीडिया की भी कमी है जो हम केवल कागज पर दिखाया काम हे न्यूज़ पर प्रसारित करते है अगर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करके सरकार तक जाये तो ये सिस्टम सुधर सकता है और ऐसे न जाने कितने मजदूरों कोभूख से मरने से बचाया जा सकता है.

अब भले केंद्र या राज्य सरकार कितने भी वादे या दावे करें लेकिन गांव पहुंचते-पहुंचते ये दावे दम तोड़ देती हैं.

 

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