CORONA STORY

“मैडम ये जो वर्दी है ना ये बहुत ताक़त देती है.” कहानी पुलिस ऑफिसर संध्या शिलवंत की…

अक्सर हम पुलिस के लिए बोलते है, इन सबको कोई काम नहीं करना होता इनसे तो दूर ही रहना चाहिए, अपने पर ही कैस लगा कर जेल में पटक देंगे। इनसे न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी। कभी हमने इनके काम का नहीं सोचा कैसे करते है कैसे नहीं कितने दिन सोते है कितने दिन नहीं। दिवाली पर घर क्यों नहीं जाते, इलेक्शन के टाइम भी होते है, ईद हो या होली हमेशा मिल जाते है गश्त करते हुए.

आज जब कोरोना वायरस पूरी दुनिया में महामारी ले आया है तब भी यह आगे आकर खड़े है क्या इनका कोई परिवार नहीं है, क्या इनके बच्चे इन्हे नहीं बोलते पापा आप मत जाओ बाहर कोरोना की महामारी है. पर ये आज भी देश की सेवा के लिए आगे खड़े होते है. यह ताकत कहा से आती है इन्हे ?

कोरोना वायरस के चलते लोग इतना डर चुके है की अगर उनके परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाये तो भी अंतिम संस्कार करने के लिए डेड बॉडी तक नहीं लेकर जाते है.

इसी के चलते आज हम कोरोना स्टोरी में ऐसे हे नायक की बात कर रहे है, जो उनका अंतिम संस्कार कर रही है जिनका कोई नहीं है या जिन्होंने बॉडी लेने से मना कर दिया है. मुंबई पुलिस में नायक के पद पर कार्यरत संध्या शिलवंत।

राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने भी उनकी तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया, ”शाहूनगर पुलिस स्टेशन की कॉन्स्टेबल संध्या शिलवंत ने एक दिन में चार लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया. आज तक इस तरह से उन्होंने छह लोगों के अंतिम संस्कार किए हैं. अगर आपके मन में सोशल कमिटमेंट हो तो हर तरह के भय के दरवाज़े बंद हो जाते हैं”- उनके ये शब्द सिर्फ़ पुलिस विभाग के लिए ही नहीं सभी के लिए प्रेरणादायक हैं. दरअसल, संध्या शाहू नगर पुलिस थाने में एक्सिडेंटल डेथ रिपोर्ट या ADR का काम संभालती हैं.

COVID-19 के दौर में उन्होंने एक दिन में चार शवों का अंतिम संस्कार किया जिसमें से एक कोरोना पॉजिटिव पाया गया था. 14 मई के दिन चार शव और 24 अप्रैल को 2 शव का मैंने अंतिम संस्कार किया और 26 मई को दो शवों का. डर रहता है मुझे भी इन शवों का अंतिम संस्कार ऐसे समय में हो रहा है जब कोरोना वायरस का पूरा देश सामना कर रहा है.

जब गृह मंत्री द्वारा की उनकी प्रशंसा की गयी तो आपको केसा लगा इसके जवाब में संध्या ने कहा “आपको लगेगा कि मेरी प्रशंसा हो रही है इसलिए मैं ऐसा कह रही हूं पर ये मेरी ड्यूटी है और समाज के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी भी है जो निभानी पड़ती है. मैं अपने विचारों को सकारात्मक रखती हूं. बस!”

मैं जिस विभाग में हूं इसके लिए मुझे लोकमान्य तिलक अस्पताल जाना ही पड़ता है. वहां हर तरह के केस आते हैं जिसमें कोविड के भी होते हैं और संक्रमित होने का डर रहता है.

संध्या बताती हैं कि महाराष्ट्र में केस हर दिन बढ़े हैं. जिससे उनकाकाम और जिम्मेदारी के साथ बढ़ गया है. ऐसे में हम पुलिसकर्मियों के भी टेस्ट करवाए गए जिसमें कई पुलिसकर्मियों में टेस्ट पॉजिटिव आया है और जब मेरा टेस्ट हुआ तो वो निगेटिव आया. मैंने दिमाग़ में आने ही नहीं दिया कि मुझे कोरोना हो सकता है. यही कारण है की में  अपना काम अच्छी तरह से कर पा रही हु. वर्दी का तो काम हे यही है जहा आम जनता के अंदर इसका विश्वास हो, और यही विश्वास मुझे शक्ति देता है.

उनको चिंता भी है अब जब पुलिसकर्मियों में मामले सामने आ रहे हैं, इससे स्टाफ़ की कमी भी हो रही है. पर मे अगर मैं डर जाऊंगी और ऑफ़िस आना बंद कर दूंगी तो कैसे चलेगा?

जब उनसे पूछा आपके बच्चे छोटे हैं तो संध्या ने कहा कि वो अपने बच्चों से अपने काम के बारे में कोई बात नहीं करतीं और जब मैंने पूछा कि अख़बारों में तुम्हारी फोटो आई तो तुम्हारी 13 साल की बेटी को पता ही चल गया होगा कि जिन चार शवों का अंतिम संस्कार तुमने किया था उसमें से एक Covid पोजिटिव था. इसके जवाब में संध्या ने कहा कि बेटी ने उन्हें ”congrats ‘ कहा.

संध्या बताती है ”मैं 2 साल से ADR का काम संभाल रही हूं. अब तक करीब 20 शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हूं. मेरे लिए ये एक पुण्य का काम है. शायद पिछले जन्म का कुछ होता है तभी आपको ये सौभाग्य मिलता है. नहीं तो जिन लोगों का कोई नहीं होता आप उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं जो किसी पुण्य के काम से कम नहीं होता.”

ADR  विभाग में कार्यरत व्यक्ति का काम लापता, गुमशुदा या अज्ञात लोगों की मौत हो जाने के बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के साथ शुरु हो जाता है. संदिग्ध परिस्थिति में मौत होने से कई बार शरीर के अंगों को फोरेंसिक लेबोरेटरी भेजा जाता है. संध्या बताती है कि उनका काम फेफड़े, हार्ट जैसे अंगों को लेबोरेटरी तक ले जाने का होता है. जांच के बाद वे फाइनल पोस्टमार्टम रिपोर्ट अधिकारियों के समक्ष सौंपती हैं. इस बीच कई बार मृत के परिजन आ जाते हैं और शव ले जाते हैं.

संध्या के मुताबिक जिन मृतकों के शव को लेने कोई नहीं आता उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है. लेकिन कोविड-19 के कारण हमें तुरंत शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए कहा जा रहा है लेकिन कई केस में शव हम लंबे समय तक भी रखते है जहां जांच की ज़रुरत होती है.

वो कहती हैं कि वो अपने रिश्तेदारों की मौत के दौरान कभी श्मशान घाट नहीं गई क्योंकि हिंदू समाज में महिलाएं श्मशान जाती भी नहीं है लेकिन ”अब ये मेरी ड्यूटी है.”

जहां Covid-19 के दौरान काम कर रहे फ्रंटलाइन वर्कर की प्रशंसा हो रही थी वहीं ख़बरें ऐसी भी आईं कि कुछ मामलों में परिवारों ने कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति का शव लेने से इंकार कर दिया या उनको अपने इलाक़े में दफ़नाने का विरोध भी किया.

संध्या शिलवंत की तरह ही न जाने कितने अफसर अपनी जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे है.हम सलाम करते है उनके द्वारा किये गए काम को. 

अगर आपके पास भी ऐसे हे कोई स्टोरी है जो इस महामारी के समय भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी न भूलते हुए अपने काम के साथ देश को आगे ले जाने में सहयोग कर रही है. आपके द्वारा किया गया कार्य मानवता को बचाये रखा है. हमसे Email के जरिये जुड़े indiafakenews1@gmail.com 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *